आज मुकदमे का पांचवां दिन था। अदालत खचाखच भरी हुई थी। कहीं पैर रखने की जगह तक नहीं थी। बाहर मीडिया के लोगों का हुजूम था। सभी लोग सांस रोके फैसले का इंतज़ार कर रहे थे। मुकदमा था क्रीम चुराने का। दो लड़कों ने मर्द होते हुए भी लड़कियों वाली फ़ेयरनेस क्रीम चुराई थी और वे रंगे चेहरे पकड़े गए थे। अदालत में सरकारी वकील की आवाज़ गूंजी “ये कोई ऐसी-वैसी क्रीम नहीं है माई लॉर्ड। इसे लगाकर लड़कियां गोरी हो जाती हैं, वो काबिल हो जाती हैं, उनमें आत्मविश्वास आ जाता है, उनकी नौकरी लग जाती है और उन्हें अच्छा वर मिल जाता है।”
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| मर्दों वाली क्रीम |
“क्या ये सब क्रीम लगाने से होता है!” जज साहब ने अचरज से पूछा। “जी माई लॉर्ड! जब तक लड़की इस क्रीम को नहीं लगाती, उसकी शादी नहीं होती। क्रीम लगाते ही लड़कों की लाइन लग जाती है। माई लॉर्ड पहले लड़के लड़कियों की नींद चुराते थे, उनकी आंखों से काजल चुराते थे…और आजकल के ये लड़के उनकी फ़ेयरनेस क्रीम चुराने में लगे हैं।” जज साहब ने आवेशित स्वर में कहा “इस देश में ये सब क्या हो रहा है। मर्द लड़कियों की क्रीम चुरा रहे हैं, पुलिस अफ़सर राधा बनकर नाच रहे हैं, शाहरुख़ ख़ान औरतों की तरह टब में नहा रहा है...आख़िर इस देश के मर्दों को हो क्या गया है।”
सरकारी वकील कठघरे में सिर झुकाए खड़े दोनों नौजवानों की ओर मुख़ातिब हुए “तुम्हें अपनी सफ़ाई में कुछ कहना है...।” “अपनी सफ़ाई के लिए ही तो क्रीम चुरा रहा था।” सांवले लड़के ने कातर पुकार की। वकील साहब गुर्राए “जो पूछा जा रहा है उसका ठीक-ठीक जवाब दो।” अबकी बार दूसरा लड़का बोला “माई लॉर्ड सच्चाई ये है कि हम दोनों गोरा होना चाहते थे, क्योंकि इस देश में सबसे ज़्यादा पूछ अंग्रेज़ी बोलने वालों और गोरे रंग वालों की है…इंगलिश स्पीकिंग कोर्स में तो हमने दाखिला ले लिया था, बस रंग रह गया था। उसी के लिए हम ये क्रीम...” कहते-कहते लड़के का गला भर आया। अदालत में सभी की नज़रें लड़के पर जमी हुई थीं। उसने थोड़ा संभलकर कहा “माई लॉर्ड, हमारा गुनाह सिर्फ़ इतना है कि हमें पता नहीं था कि मार्केट में मर्दों वाली फ़ेयरनेस क्रीम भी आ चुकी है, वरना हम ऐसा क्राइम कभी ना करते।”
दूसरा लड़का उत्तेजित होकर बोला “वकील साहब मैं आपसे पूछता हूं, क्या आपने कभी कोई क्रीम नहीं लगाई? मैं अदालत में मौजूद हर इंसान से पूछना चाहता हूं क्या उसने कभी कोई क्रीम नहीं लगाई? बताइए आप लोग चुप क्यों हैं? दूसरे लड़के ने उसे रोकना चाहा “ये क्या कर...” “मुझे बोलने दे यार, क्रीम ना चुरा ली कोई एटम बम बनाने का प्लान चुरा लिया। मैं अब चुप नहीं रहूंगा। जज साहब अपने गाल पर हाथ रखकर कसम खाइए, क्या आपने कभी कोई फ़ेयरनेस क्रीम नहीं लगाई…क्या आप गोरा नहीं होना चाहते थे?” कहते-कहते नौजवान रोने लगा। अदालत में सन्नाटा छा गया। सभी लोग स्तब्ध रह गए। वकील साहब बारी-बारी से अपनी दोनों बगलें झांकने लगे। वहां मौजूद सभी लोगों की आंखों में नमी उतर आई थी। क्रीम को लेकर उन्होंने कभी इस तरह नहीं सोचा था। पता नहीं जज साहब क्या फ़ैसला सुनाएंगे।
मगर ये क्या...जज साहब भी अपनी आंखें पोंछ रहे थे। उन्होंने रुंधे गले से बोलना शुरू किया “इस नौजवान ने आज अदालत की आंखें खोल दीं। ये अदालत आज तक सभी क्रीमों को एक ही समझती आई थी। मैं इस नौजवान के दर्द को महसूस कर सकता हूं। अदालत इन्हें बाक्रीम बरी करती है और सरकार को आदेश देती है कि हर्जाने के तौर पर इन्हें दस किलो क्रीम दे, ताकि इन्हें ज़िंदगी में कभी भी क्रीम की वजह से बुरे दिन ना देखने पड़ें। सरकार का फ़र्ज़ है कि वो बेरोजगार युवकों को क्रीम पर सब्सिडी देने का बंदोबस्त करे, ताकि इस देश के किसी भी नौजवान को महज सांवले रंग की वजह से कोई नुकसान ना उठाना पड़े।”
-नवभारत टाइम्स, 9 दिसंबर, 2005
